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महात्मा गांधी के सपनों के भारत में एक सपना राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को प्रतिष्ठित करने का भी था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है। नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन (10-14 जनवरी,1975) में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए तथा एक अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की जाय जिसका मुख्यालय वर्धा में हो। अगस्त,1976 में मॉरीशस में आयोजित द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन में यह तय किया गया कि मॉरीशस में एक विश्व हिंदी केंद्र की स्थापना की जाए जो सारे विश्व में हिंदी की गतिविधियों का समन्वय कर सके।
चतुर्थ विश्व हिंदी सम्मेलन (दिसम्बर-1993) के बाद विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना मॉरीशस में हुई और भारत में एक अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना को मूर्त रूप देने की आवश्यकता समझी गयी। यह संभव हुआ वर्ष 1997 में- जब भारत की संसद द्वारा एक अधिनियम पारित करके महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना राष्ट्रपिता की कर्मभूमि वर्धा में की गयी। इस विश्वविद्यालय की स्थापना से भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की एक लालसा भी पूरी हुई जो उनके मन-मस्तिष्क में छायी रही थी। वह लालसा थी ‘अपने उद्योग से एक शुद्ध हिंदी की यूनिवर्सिटी स्थापित करना’।
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संसद द्वारा वर्ष 1997 में पारित अधिनियम (क्रमांक-3) शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य के संवर्द्धन एवं विकास हेतु एक ऐसे आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना प्रस्तावित करता है जो हिंदी भाषा में श्रेष्ठतर क्रियात्मक कार्यदक्षता विकसित करने में समर्थ हो, ताकि इसे एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सके। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में इस विश्वविद्यालय ने कार्य करना आरंभ किया। महात्मा गांधी के दार्शनिक आलोक में स्थापित इस विश्वविद्यालय ने हिंदी भाषा और साहित्य के साथ-साथ गांधी जी के प्रिय सिद्धांतों पर आधारित विषयों- ‘अहिंसा एवं शांति अध्ययन’ तथा ‘स्त्री अध्ययन’- को अपने पाठ्यक्रम का प्रमुख हिस्सा बनाया है। यहाँ हिंदी को तकनीकी जानकारी और विविध व्यवसायों की संवाहक भाषा के रूप में विकसित करने पर भी बल दिया जा रहा है। इससे संदर्भित नये-नये पाठ्यक्रम प्रवर्तित किए जा रहे हैं। इस विश्वविद्यालय की मंशा है कि हिंदी माध्यम से ज्ञान के विभिन्न अनुशासन एवं परिक्षेत्र न केवल भारत में अपितु विश्व जनमानस में अपनी गहरी पैठ बनायें और हिंदी विश्व-हृदय का हार बने। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास इसका साक्षी है कि भारत संघ की राष्ट्रभाषा हिंदी आपसी सहयोग, साहचर्य एवं प्यार की भाषा है। इसे विश्वसमुदाय में स्थापित करना इन मूल्यों के संवर्द्धन हेतु अत्यंत लाभप्रद होगा।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अपने स्वरूप में एक अनूठा विश्वविद्यालय है। हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से कार्यरत यह दुनिया में अकेला विश्वविद्यालय है जहाँ फ्रेंच, चीनी, स्पेनिश और जापानी जैसी विदेशी भाषाएं हिंदी माध्यम से पढ़ाई जाती हैं। ‘ग्लोबल हिंदी’ की राह पर यह एक बड़ा मील का पत्थर है।
हिंदी को विश्वभाषा बनाने के मकसद से इस विश्वविद्यालय ने दो महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। विदेशों में विश्वविद्यालयों व संस्थाओं में हिंदी व हिंदी माध्यम से विभिन्न अनुशासनों के अध्ययन व अनुसंधान के लिए यह विश्वविद्यालय समन्वयक की भूमिका निभाने जा रहा है तो विश्वभर के हिंदी पाठकों को भारतेंदु से लेकर अब तक के कॉपीराइट मुक्त महत्वपूर्ण हिंदी साहित्य को सुलभ कराने का बीड़ा इसने उठाया है। विश्वविद्यालय की वेबसाईट हिंदीसमयडॉटकॉम पर उत्कृष्ट हिंदी साहित्य के एक लाख पृष्ठ उपलब्ध कराए जा रहे हैं। दूसरे चरण में यह साहित्य विश्व की प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध कराया जाएगा। ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में हिंदी में स्तरीय सामग्री उपलब्ध हो सके इसका प्रयास भी विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा है। स्त्री अध्ययन, मानविकी तथा फिल्म और नाटक के क्षेत्रों में दुनिया भर की भाषाओं में फैली हुई महत्वपूर्ण पाठय-सामग्री का अनुवाद विश्वविद्यालय कर रहा है और शीघ्र ही यह पाठय-सामग्री विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के साथ ही अन्य अध्येताओं को भी उपलब्ध हो सकेगी।
इस विश्वविद्यालय को उच्च शिक्षा के एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में विकसित किया जा रहा है। हिंदी भाषा में भारतीय मूल्यों व परंपराओं के संवर्द्धन के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने तथा इसे इसी रूप में दुनिया के सामने स्थापित करने का अभियान विश्वविद्यालय द्वारा चलाया जा रहा है। विश्वविद्यालय की कार्य-संस्कृति, प्रशासन व कार्य-व्यवहार में गांधी जी के विचार मार्गदर्शन का कार्य करते हैं।
हिंदी को विश्वमंच पर प्रतिष्ठित किए जाने हेतु यह आवश्यक है कि हिंदी का विश्व की अन्य भाषाओं के साथ बेहतर संबंध हो। इनके बीच एक सक्रिय, बहुआयामी एवं व्यापक आदान-प्रदान हो। विविध भाषाओं के छात्र, शोधार्थी, अनुसंधानकर्ता, अध्यापक एक-दूसरे के बीच जाकर अध्ययन-अध्यापन व अनुसंधान करें। इससे विश्व की अन्य भाषाओं से हिंदी का संपर्क समृद्ध होगा व ज्ञान के नये क्षितिज उदित होंगे। ज्ञान-विज्ञान की एक संवाहक भाषा के रूप में हिंदी इस आदान-प्रदान का केंद्र-बिंदु बने, विश्वविद्यालय इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता हेतु कटिबद्ध है।
विश्वविद्यालय में चार अलग-अलग संकाय हैं –
- 1. भाषा विद्यापीठ
- 2. साहित्य विद्यापीठ
- 3. संस्कृति विद्यापीठ
- 4. अनुवाद तथा निर्वचन विद्यापीठ
इसके साथ ही विश्वविद्यालय का दूरशिक्षा कार्यक्रम शिक्षा को शिक्षार्थियों के द्वार तक पहुँचाने के एक अलग प्रकल्प के रूप में क्रियाशील है।
उद्देश्य:
- क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी का सम्यक विकास।
- हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का सुसंगत प्रयास।
- महात्मा गांधी के मानवतावादी मूल्यों; यथा - शांति, अहिंसा, सत्य, धर्मनिरपेक्षता, आदि का उन्नयन, स्थापन एवम् प्रसार।
- हिंदी को जनसंचार, व्यापार, प्रबंधन, विज्ञान एवम् तकनीकी शिक्षा, तथा प्रशासनिक कामकाज की भाषा के रूप में दक्ष बनाना ताकि इसे रोजगार से जोड़ा जा सके।
- हिंदी के माध्यम से अंतर-अनुशासनिक ज्ञान-प्रणाली को बढ़ावा देना।
- एक अंतरराष्ट्रीय शोध केंद्र के रूप में विश्वविद्यालय का विकास।
- अंतरराष्ट्रीय विमर्श के एक केंद्र के रूप में विश्वविद्यालय का विकास।
दृष्टि:
- राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के मध्य व्यापक एवम् बहुल संपर्क व समन्वय पर जोर।
- भारतीय एवम् वैश्विक भाषाओं के अन्त:सम्पर्क से समन्वय की संस्कृति का पल्लवन एवं विकास।
- हिंदी को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं संदेशों की संवाहक भाषा के रूप में प्रतिष्ठा।
- ज्ञान, शांति एवं मैत्री की परिकल्पना को मूर्त रूप देने का गंभीर प्रयास।
Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya or Mahatma Gandhi International Hindi University was established to fulfil a dream of Mahatma Gandhi, the father of the nation. Mahatma Gandhi was of the firm opinion that Hindi should not only be the national language of the country but it should also gain the status of a world language. The dream of the Mahatma was reflected in the resolutions passed by the First World Hindi Conference organized in Nagpur in the year 1975. The first resolution demanded Hindi to be made one of the official languages of the United Nations Organisation and the second resolved to establish an International Hindi University at Wardha, the land where Gandhi ji experimented all programmes dear to his heart.
The University was created by an Act passed by the Indian Parliament in 1997 .Section-3 of the Act mandates special and unique responsibility to the University to enrich Hindi language and literature by teaching and research and make it capable of becoming a World language in the real sense of the term. Since 1997 the University is functioning as a residential University solely dedicated to the cause of Hindi. Spread in an area of more than two hundred acres, the fast coming University buildings are pleasant blend of aesthetics and functional utility.
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Mahatma Gandhi, Hindi and International are three key words which are integrally woven in the philosophy guiding the functioning of the institution. It has initiated academic programmes in areas which were important in Gandhi’s socio – political agenda such as Non Violence, Peace and Conflict Resolution, Women Studies and Tribal and Dalit Studies. To provide Hindi, tools necessary to become a language of serious study and research, many disciplines of knowledge are being taught in Hindi and efforts are on to produce standard text books and other reading material in the language. The University has also undertaken an ambitious project to publish an Encyclopaedia of Social Sciences in Hindi. It is expected that in next few years this project will see the light of the day. To fulfil its international commitments the University is offering its services to the Hindi Departments across the globe. It is coordinating international efforts in areas like syllabus development, content creation and audio-visual aids to students who study Hindi as foreign language.
The main OBJECTIVES of the University are:
- to develop Hindi as a regional, national and international language
- to develop university as a centre of international discourse.
- to develop university as an international research centre
- to spread and follow the humanitarian values of Mahatma Gandhi – peace, ahimsa, truth and secularism
- to strengthen Hindi as a language of communication, business management, scientific & technical education and administrative work and relate its connectivity with employment
- to provide intellectual environment in which scholarship and learning may thrive in Hindi in a better way,
- to develop interdisciplinary research and publication programme in Hindi.
- to encourage new discourses with a social-cultural commitment,
There are four Schools in the University:
- School of Language
- School of Culture
- School of Literature
- School of Translation & Interpretation
And following four more Schools are being added shortly:
- School of Management
- School of Education
- School of Law
- School of Humanities
Besides this, the Distance Education programme of the University is actively involved in spreading education among students in all the areas of the country. An I.T. Centre i.e. Laboratory in Informatics for the Liberal Arts (LILA) has also been envisaged and is in the existence. Three Centers namely Baba Sahab Ambedkar Center for Dalit and Tribal Studies, Mahatma Gandhi Fuji Guruji Center for Ahinsa and Peace Studies and Bhadant Anand Kaushalyayan Center for Budhhist Studies are also in existence and are involved in serious research and study in various fields.
प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन (10-14 जनवरी,1975 नागपुर, भारत)
- संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए।
- वर्धा में विश्व हिंदी विद्यापीठ की स्थापना हो।
- विश्व हिंदी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए ठोस योजना बनाई जाए।
द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन (28-30 अगस्त,1976 मोका, मॉरीशस)
- मॉरीशस में एक विश्व हिंदी केंद्र की स्थापना की जाए जो सारे विश्व में हिंदी की गतिविधियों का समन्वय कर सके।
- एक अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका का प्रकाशन किया जाए जो भाषा के माध्यम से ऐसे समुचित वातावरण का निर्माण कर सके जिसमें मानव विश्व का नागरिक बना रहे और आध्यात्म की महान शक्ति एक नए समन्वित सामंजस्य का रूप धारण कर सके।
- हिंदी को संयुक्त राष्ट्र् संघ में एक आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान मिले। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाए।
तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन (28-30 अक्टूबर,1983 नई दिल्ली, भारत)
- अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के प्रचार-प्रसार की संभावनाओं का पता लगा कर इसके लिए गहन प्रयास किए जाएं।
- हिंदी के विश्वव्यापी स्वरूप को विकसित करने के लिए विश्व हिंदी विद्यापीठ स्थापित करने की योजना को मूर्त रूप दिया जाए।
- विगत दो सम्मेलनों में पारित संकल्पों की संपुष्टि करते हुए यह निर्णय लिया गया कि अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के विकास और उन्नयन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थायी समिति का गठन किया जाए। इस समिति में देश-विदेश के लगभग 25 व्यक्ति सदस्य हों।
चतुर्थ विश्व हिंदी सम्मेलन (2-4 दिसम्बर,1993 मोका, मॉरीशस)
- विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस में स्थापित किया जाए।
- भारत में अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए।
- विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठ खोले जाएं।
- भारत सरकार विदेशों से प्रकाशित दैनिक समाचार-पत्र, पत्रिकाएं, पुस्तकें प्रकाशित करने में सक्रिय सहयोग करे।
- हिंदी को विश्व मंच पर उचित स्थान दिलाने में शासन और जन-समुदाय विशेष प्रयत्न करे।
- विश्व के समस्त हिंदी प्रेमी अपने निजी एवं सार्वजनिक कार्यों में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करें और संकल्प लें कि वे कम से कम अपने हस्ताक्षरों , निमंत्रण पत्रों, निजी पत्रों और नामपट्टों में हिंदी का प्रयोग करेंगे।
- सम्मेलन के सभी प्रतिनिधि अपने-अपने देशों की सरकारों से संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए समर्थन प्राप्त करने का सार्थक प्रयास करेंगे।
पांचवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन (4-8 अप्रैल,1996 पोर्ट ऑफ स्पेन, त्रिनिदाद एंड टोबेगो)
- विश्व व्यापी भारतवंशी समाज हिंदी को अपनी संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करेगा।
- मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना के लिए भारत में एक अंतर-सरकारी समिति बनाई जाए।
- सभी देशों, विशेषकर जिन देशों में अप्रवासी भारतीय बड़ी संख्या में हैं, उनकी सरकारें अपने-अपने देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था करें। उन देशों की सरकारों से आग्रह किया जाए कि वे हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए राजनीतिक योगदान और समर्थन दें।
छठा विश्व हिंदी सम्मेलन (14-18 सितम्बर,1999 लंदन)
- विश्व भर में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन, शोध, प्रचार-प्रसार और हिंदी सृजन में समन्वय के लिए महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय केंद्र सक्रिय भूमिका निभाए।
- विदेशों में हिंदी के शिक्षण, पाठ्यक्रमों के निर्धारण, पाठ्य-पुस्तिकों के निर्माण, अध्यापकों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था भी विश्वविद्यालय करे और सुदूर शिक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
- मॉरीशस सरकार अन्य हिंदी-प्रेमी सरकारों से परामर्श कर शीघ्र विश्व हिंदी सचिवालय स्थापित करे।
- हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता दी जाए।
- हिंदी को सूचना तकनीक के विकास, मानकीकरण, विज्ञान एवं तकनीकी लेखन, प्रसारण एवं संचार की अद्यतन तकनीक के विकास के लिए भारत सरकार एक केंद्रीय एजेंसी स्थापित करे।
- नई पीढ़ी में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए आवश्यक पहल की जाए।
- भारत सरकार विदेश स्थित अपने दूतावासों को निर्देश दे कि वे भारतवंशियों की सहायता से विद्यालयों में एक भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था करवाएँ।
सातवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन (5-9 जून,2003 पारामारिबो, सूरीनाम)
- संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया जाए।
- विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठ की स्थापना हो।
- भारतीय मूल के लोगों के बीच हिंदी के प्रयोग के प्रभावी उपाय किए जाएं।
- हिंदी के प्रचार हेतु वेबसाइट की स्थापना और सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग हो।
- हिंदी विद्वानों की विश्व-निर्देशिका का प्रकाशन किया जाए।
- विश्व हिंदी दिवस का आयोजन हो।
- कैरेबियन हिंदी परिषद की स्थापना हो।
- दक्षिण भारत के विश्व विद्यालयों में हिंदी विभाग की स्थापना हो।
- हिंदी पाठ्यक्रम में विदेशी हिंदी लेखकों की रचनाओं को शामिल किया जाए।
- सूरीनाम में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था की जाए।
आठवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन (13-15 जुलाई,2007 न्यूयार्क)
- विदेशों में हिंदी शिक्षण और देवनागरी लिपि को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से दूसरी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए एक मानक पाठ्यक्रम बनाया जाए तथा हिंदी के शिक्षकों को मान्यता प्रदान करने की व्यवस्था की जाए।
- विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज को सक्रिय करने एवं उद्देश्य परक बनाने के लिए सचिवालय को भारत तथा मॉरीशस सरकार सभी प्रकार की प्रशासनिक एवं आर्थिक सहायता प्रदान करें और दिल्ली सहित विश्व के चार-पाँच अन्य देशों में इस सचिवालय के क्षेत्रीय कार्यालय खोलने पर विचार किया जाए। सम्मेलन सचिवालय यह आह्वान करता है कि हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने के लिए विश्व मंच पर हिंदी वेबसाइट बनाई जाए।
- हिंदी में ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विषयों पर सरल एवं उपयोगी हिंदी पुस्तकों के सृजन को प्रोत्साहित किया जाए। हिंदी में सूचना प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने के प्रभावी उपाय किए जाएं। एक सर्वमान्य व सर्वत्र उपलब्ध यूनिकोड को विकसित व सर्वसुलभ बनाया जाए।
- विदेशों में जिन विश्वविद्यालयों तथा स्कूलों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन होता है उनका एक डेटाबेस बनाया जाए और हिंदी अध्यापकों की एक सूची भी तैयार की जाए।
- यह सम्मेलन विश्व के सभी हिंदी प्रेमियों और विशेष रूप से प्रवासी भारतीयों तथा विदेशों में कार्यरत भारतीय राष्ट्रिकों से भी अनुरोध करता है कि वे विदेशों में हिंदी भाषा, साहित्य के प्रचार-प्रसार में योगदान करें ।
- वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में विदेशी हिंदी विद्वानों के अनुसंधान के लिए शोधवृत्ति की व्यवस्था की जाए।
- केंद्रीय हिंदी संस्थान भी विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार व पाठ्यक्रमों के निर्माण में अपना सक्रिय सहयोग दे।
- विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठ की स्थापना पर विचार-विमर्श किया जाए।
- हिंदी को साहित्य के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और वाणिज्य की भाषा बनाया जाए।
- भारत द्वारा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर आयोजित की जाने वाली संगोष्ठियों व सम्मेलनों में हिंदी को प्रोत्साहित किया जाए।
9वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन (22-24 सितंबर, 2012 जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका)
- 1. 9वां विश्व हिंदी सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग शहर में आयोजित किया गया। दक्षिण अफ्रीका में सम्मेलन का आयोजन न केवल दक्षिण अफ्रीका के साथ बल्कि इस पूरे क्षेत्र के साथ भारत एवं भारतीयों के ऐतिहासिक, सुदृढ़ एवं बढ़ते हुए संबंधों को परिलक्षित करता है। यह हिंदी प्रेमियों के वैश्विक समुदाय की इस देश के साथ महात्मा गांधी के संबंधों के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि है।
- 2. इस सम्मेलन ने दक्षिण अफ्रीका के महान नेता डॉ.नेल्सन मंडेला के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया जिन्होंने महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित शांति, अहिंसा एवं न्याय के शाश्वत सिद्धांतों को आत्मसात करके पुन: केवल अपने देश के लिए ही नहीं बल्कि विश्व मानव के कल्याण के लिए एक सम्मानित जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। सम्मेलन डॉ.मंडेला को ससम्मान शुभकामनाएं ज्ञापित करता है।
- 3. 22 से 24 सितम्बर 2012 को दक्षिण अफ्रीका में आयोजित 9वें विश्व हिंदी सम्मेलन ने, जिसमें विश्वभर के हिंदी विद्वानों, साहित्यकारों और हिंदी प्रेमियों आदि ने भाग लिया, रेखांकित किया कि:
- क. हिंदी के बढ़ते हुए वैश्वीकरण के मूल में गांधी जी की भाषा दृष्टि का महत्वपूर्ण स्थान है।
- ख. मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना की संकल्पना प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान की गई थी। यह सम्मेलन इस सचिवालय की स्थापना के लिए भारत और मॉरीशस की सरकारों द्वारा किए गए अथक प्रयासों एवं समर्थन की सराहना करता है।
- ग. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय भी विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित संकल्पों का ही परिणाम है। यह विश्वविद्यालय हिंदी के प्रचार-प्रसार और उपयुक्त आधुनिक शिक्षण उपकरण विकसित करने में सराहनीय कार्य कर रहा है।
- घ. सम्मेलन केंद्रीय हिंदी संस्थान की भी सराहना करता है कि वह उपयुक्त पाठ्यक्रम और कक्षाओं का संचालन करके विदेशियों और देश के गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों के बीच हिंदी का प्रचार-प्रसार कर रहा है।
- ड. सम्मेलन इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रिंट मीडिया विशेषकर हिंदी मीडिया, फिल्मों और थिएटर द्वारा किए जा रहे कार्य की भी प्रशंसा करता है जो हिंदी के माध्यम से घर-घर तक ज्ञान पहुंचा रहे हैं।
- च. दक्षिण अफ्रीका में हिंदी शिक्षा संघ तथा अन्य संस्थाओं द्वारा हिंदी शिक्षण एवं हिंदी के प्रसार के लिए किए जा रहे कार्य की प्रशंसा करता है और हिंदी को समर्थन प्रदान करने के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करता है।
- छ. हिंदी में युवा वर्ग की रुचि निरंतर बढ़ रही है जो सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी उपकरण विकसित किए जाने के साथ-साथ हिंदी फिल्मों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा सोशल मीडिया की भूमिका का ही एक भाग है और हिंदी भाषा को व्यापार, वाणिज्य और बाजार से जोड़ने का परिणाम है।
- ज. विदेशी नागरिक हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति में अपनी रुचि के अलावा व्यावसायिक कारणों से भी हिंदी सीख रहे हैं जो वैश्विक संदर्भ में हिंदी की प्रासंगिकता और इसके महत्व को प्रतिपादित करते हैं।
- झ. हिंदी के विकास में विदेश में रह रहे प्रवासी लेखकों की महत्वपूर्ण भूमिका सराहनीय है।
- ट. सम्मेलन में स्मारिका और गगनांचल पत्रिका के विशेषांक प्रकाशित किए गए। इनके सुचारु रूप से किए गए प्रकाशन के लिए सम्मेलन इनके संपादक मंडलों और लेखकों की सराहना करता है।
- ठ. हिंदी भाषा, साहित्य, सूचना प्रौद्योगिकी एवं विशेष तौर पर महात्मा गांधी के जीवन एवं साहित्य पर लगाई गई समेकित प्रदर्शनी सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण आकर्षण रही है और इसमें सभी प्रतिभागियों ने गहरी रुचि दिखाई है। प्रदर्शनी के आयोजकों के प्रयास की सराहना करता है।
- ड. इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद तथा दक्षिण अफ्रीका के स्थानीय कलाकारों द्वारा की गई सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी सभी उपस्थित प्रतिभागियों को प्रभावित किया। सम्मेलन इन कार्यक्रमों के आयोजकों की सराहना करता है।
- ढ़. सम्मेलन की दैनिक गतिविधियों पर प्रतिदिन एक समाचार पत्रिका निकाली गई। इसके लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए प्रयत्न एवं परिश्रम की सम्मेलन सराहना करता है।
- ण. इस अवसर पर दक्षिण अफ्रीका की सरकार द्वारा किए गए समर्थन, सहयोग, सहायता एवं भागीदारी के लिए सम्मेलन ने दक्षिण अफ्रीका की सरकार के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया जिसके कारण इस सम्मेलन का आयोजन सुचारु रूप से संपन्न हो सका।
- 2. 9वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उपर्युक्त बिन्दुओं पर हुई कार्रवाई के आलोक में सम्मेलन चाहता है कि:
- i- मॉरीशस में स्थापित विश्व हिंदी सचिवालय विभिन्न देशों में हिंदी शिक्षण से संबद्ध विश्वविद्यालयों, पाठशालाओं एवं शैक्षिक संस्थानों से संबंधित एक डाटाबेस का बृहत स्त्रोत केंद्र स्थापित करे।
- ii- विश्व हिंदी सचिवालय विश्व भर के हिंदी विद्वानों, लेखकों तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार से संबद्ध लोगों का भी एक डाटाबेस तैयार करे।
- iii- हिंदी भाषा की सूचना प्रौद्योगिकी के साथ अनुरूपता को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी संस्थाओं द्वारा हिंदी भाषा संबंधी उपकरण विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य जारी रखा जाए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हर संभव सहायता प्रदान की जाए।
- iv- विदेशों में हिंदी शिक्षण के लिए एक मानक पाठ्यक्रम तैयार किए जाने के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को अधिकृत किया जाता है।
- v- अफ्रीका में हिंदी शिक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए और बदलते हुए वैश्विक परिवेश, युवा वर्ग की रुचि एवं अकांक्षाओं को देखते हुए उपयुक्त साहित्य एवं पुस्तकें तैयार की जाएं।
- vi- सूचना प्रौद्योगिकी में देवनागरी लिपि के प्रयोग पर पर्याप्त सॉफ्टवेयर तैयार किए जाएं ताकि इसका लाभ विश्व भर के हिंदी भाषियों और प्रेमियों को मिल सके।
- vii- अनुवाद की महत्ता को देखते हुए अनुवाद के विभिन्न आयामों के संदर्भ में अनुसंधान की आवश्यकता है, अत: इस दिशा में ठोस कार्रवाई की जाए।
- viii- विश्व हिंदी सम्मेलनों के बीच के अंतराल में विभिन्न देशों में विशिष्ट विषयों पर क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं। इनका उद्देश्य उनके अपने-अपने क्षेत्रों में हिंदी शिक्षण और हिंदी के प्रसार में आने वाली कठिनाइयों का समाधान खोजना है। सम्मेलन ने इसकी सराहना करते हुए इस बात पर बल दिया कि इस कार्य को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- ix- विश्व हिंदी सम्मेलनों में भारतीय और विदेशी विद्वानों को सम्मानित करने की परंपरा रही है इस विशिष्ट सम्मान के अनुरूप ही इन सम्मेलनों में विद्वानों को भेंट किए जाने वाले पुरस्कार अथवा सम्मान को गरिमापूर्ण नाम देते हुए इसे 'विश्व हिंदी सम्मान' कहा जाए।
- x- विगत में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित प्रस्ताव को रेखांकित करते हुए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किए जाने के लिए समय-बद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
- xi- दो विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच यथासंभव अधिकतम तीन वर्ष का अंतराल रहे।
- x- 10 वां विश्व हिंदी सम्मेलन भारत में आयोजित किया जाए।
- जोहान्सबर्ग,
24 सितम्बर, 2012
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